Gems Stone

अनिष्ट ग्रहों की शान्ति के लिए उपयोगी रत्न

रत्न धारण करने की विधि उपयोग आदि का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार से है:-

संस्कृत में इसे माणिक्य, पद्मराग, हिंदी में माणक, मानिक तथा अंग्रेज़ी भाषा में रूबी कहते हैं। सूर्य रत्न होने से इस ग्रह रत्न के अधिष्ठाता सूर्यदेव हैं।
पहचान विधि – असली माणिक्य लाल सुर्ख वर्ण का पारदर्शी, स्निग्ध-कान्तियुक्त और वजन में कुछ भारीपन लिए हुआ होता है। हथेली में रखने से हलकी ऊष्णता एवं सामान्य से कुछ अधिक वजन का अनुभव होता है। काँच के पात्र में रखने से इसकी हल्की लाल किरणें चारों तरफ़ से निकलती दिखाई देंगी। गाय के दूध में असली माणिक्य रखा जाये तो दूध का रंग गुलाबी दिखलाई देगा। अतएव असली एवं शुद्ध माणिक स्निग्ध, चिकना, कांतियुक्त, पानीदार, भारीपन लिए तथा कनेर पुष्प जैसे लाल वर्ण का होना चाहिए।

सूर्य बीज मंत्र – ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः

विधिपूर्वक माणिक्य धारण करने से राजकीय क्षेत्रों में प्रतिष्ठा, भाग्योन्नति, पुत्र संतान लाभ, तेजबल में वृद्धि कारक तथा हृदय रोग, चक्षुरोग, रक्त विकार, शरीर दौर्बल्यादि में लाभकारी होता है।

Read Now:- किस राशि के लिए शुभ और अशुभ होता है पुखराज

चन्द्र रत्न मोती (PEARL)

पहचान विधि – शुद्ध एवं श्रेष्ठ मोती गोल, श्वेत, उज्ज्वल, चिकना, चन्द्रमा के समान कान्तियुक्त, निर्मल एवं हल्कापन लिए होता है।

असली शुद्ध मोती धारण करने से मानसिक शक्ति का विकास, शारीरिक सौंदर्य की वृद्धि, स्त्री एवं धनादि सुखों की प्राप्ति होती है। इसका प्रयोग स्मरणशक्ति में भी वृद्धिकारक होता है।

धारण विधि – मोती चांदी की अंगूठी में शुक्ल पक्ष के सोमवार को, पूर्णिमा को, चन्द्रमा की होरा में गंगा जल, कच्चे दूध में स्नान करवाते हुए चन्द्र के बीज मंत्र – ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः का ११००० की संख्या में जाप करने के उपरान्त धारण करना चाहिए। तदुपरांत चावल, चीनी, क्षीर, श्वेत फल एवं वस्त्रादि का दान करना शुभ होगा।

चन्द्रमा का उपरत्न – चन्द्रकांत मणि (Moon Light Stone) – यह उपरत्न चाँदी जैसी चमक लिए हुए मोती रत्न के अभाव में उसका पूरक माना जाता है। इसको हिलाने से इस पर एक दूधिया जैसी प्रकाश रेखा चमकती है। यह रत्न भी मानसिक शान्ति, प्रेरणा, स्मरण शक्ति में वृद्धि तथा प्रेम में सफलता प्रदान करता है। लाभ की दृष्टि से चंद्रकांत मणि मलाई के रंग का (सफ़ेद और पीले के बीच का) उत्तम माना जाता है। इसे चाँदी में ही धारण करना चाहिए।

संस्कृत में इसे प्रवाल, अंगारकमणि तथा अंग्रेज़ी भाषा में कोरल (Coral) कहा जाता है।  मूंगा मुख्यत: लाल, सिंधूरी, हिंगुल एवं गेरूआ वर्ण का होता है।

परीक्षा  – (१) असली मूंगे को ख़ून में डाल दिया जाये तो इसके चारों और गाढ़ा रक्त जमा होने लगता है। (२) असली मूंगा यदि गौ के दूध में डाल दिया जाए तो उसमें लाल रंग की झाई सी दिखने लगती है।

धारण विधि – शुक्ल पक्ष के मंगलवार को प्रातः मंगल की होरा में मृगशिर, चित्रा या घनिष्ठा नक्षत्र एवं मेष, मकर या वृश्चिक के चन्द्रमा कालीन सोने या ताँबे की अंगूठी में जड़वा कर बीज मंत्र द्वारा अभिमंत्रित करके अनामिका अंगुली में ६, ८, १० या १२ रत्ती के वजन में धारण करना शुभ रहता है। धारण करने के उपरान्त मंगल स्तोत्र एवं मंगल ग्रह का दान शुभ होता है।

शारीरिक स्वास्थ्य एवं कुंडली में मंगल नीच राशिस्थ हो तो सफ़ेद मूँगा भी धारण किया जा सकता है।

पन्ना बुध तरह का मुख्य रत्न है। संस्कृत में इसे मरकतमणि, अशमगर्भ, सौपर्णी हरितमणि, फ़ारसी ज़बान में जमरूद व  अंग्रेज़ी भाषा में इमराल्ड (Emerald) कहा जाता है।  पन्ना हरे रंग, स्वच्छ, पारदर्शी, कोमल, चिकना व चमकदार होता है।

गुण – पन्ना धारण करने से बुद्धि तीव्र एवं स्मरण शक्ति बढ़ती है। विद्या, बुद्धि, धन एवं व्यापर में वृद्धि के लिए लाभप्रद माना जाता है। पन्ना सुख एवं आरोग्यदायक भी है। यह रत्न जादू टोने, रक्त विकार, पथरी, बहुमूत्र, नेत्र रोग, दमा, गुर्दे के विकार, पाण्डु, मानसिक विकलतादि रोगों में लाभकारी माना जाता है।

बुध बीज मंत्र – ॐ ब्रां  ब्रीं  ब्रौं सः बुधाय  नमः

गुरु रत्न पुखराज (TOPAZ)

पहचान विधि – जो पुखराज स्पर्श में चिकना, हाथ में लेने पर कुछ भारी लगे, पारदर्शी, प्राकृतिक चमक से युक्त हो वह उत्तम कोटि का माना जाता है।

गुण – पुखराज धारण करने से बल, बुद्धि, स्वास्थ्य एवं आयु की वृद्धि होती है। वैवाहिक सुख, पुत्र संतान कारक एवं धर्म-कर्म में प्रेरक होता है। प्रेत- बाधा का निवारण एवं स्त्री के विवाहसुख की बाधा को दूर करने में सहायक होता है।

धारण विधि – पुखराज रत्न ३, ५, ७, ९ या १२ रत्ती के वजन का सोने की अंगूठी में जड़वा कर तर्जनी अंगुली में धारण करें, स्वर्ण या ताम्र बर्तन में कच्चा दूध, गंगा जल, पीले पुष्पों से एवं “ॐ ऐं  क्लीं बृहस्पतये नमः ” के बीज मंत्र द्वारा अभिमंत्रित करके धारण करना चाहिए। मंत्र संख्या १९ हज़ार रहेगी।

पुखराज धनु, मीन राशि के अतिरिक्त मेष, कर्क, वृश्चिक राशि वालों को लाभप्रद रहता है। धारण करने के बाद गुरु से सम्बंधित वस्तुओं का दान करना शुभ होता है।

शुक्र रत्न हीरा (DIAMOND)

पहचान विधि – अत्यन्त चमकदार, चिकना, कठोर, पारदर्शी एवं किरणों से युक्त हीरा असली होता है।

गुण – हीरे में वशीकरण करने की विशेष शक्ति होती है। इसके पहनने से वंश-वृद्धि, धन-लक्ष्मी व संपत्ति की वृद्धि, स्त्री व संतान सुख की प्राप्ति व स्वास्थ्य में लाभ होता है। वैवाहिक सुख में भी वृद्धिकारक माना जाता है।

धारण विधि – शुकलपक्ष के शुक्रवार वाले दिन, शुक्र की होरा में, भरणी, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र एवं शुक्र, वृष, तुला या मीन राशिगत हो तो, एक रत्ती या इससे अधिक वजन का हीरा सोने की अंगूठी में जड़वा कर शुक्र के बीज मंत्र  “ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः” का १६ हज़ार की संख्या में जाप करके शुभ मुहूर्त्त में धारण करना चाहिये। हीरा मध्यमा अंगुली में धारण करना चाहिए। धारण करने के दिन शुक्र ग्रह से सम्बंधित वस्तुएँ जैसे दूध, चांदी, दही, मिश्री, चावल, श्वेत वस्त्र, चंदनादि का दान यथाशक्ति करना चाहिए।

शुक्र के उपरत्न –

ओपल – यह भी शुक्र का अन्य उपरत्न है, इसको धारण करने से सदाचार, सद्चिंतन तथा धार्मिक कार्यों की ओर रुचि रहती है। अधिक लोकप्रिय नहीं है।

शनि रत्न नीलम (SAPPHIRE)

पहचान विधि – असली नीलम  चमकीला, चमकीला, चिकना, मोरपंख के समान वर्ण वाला, नीली किरणों से युक्त एवं पारदर्शी होगा।

गुण – नीलम धारण करने से धन-धान्य, यश-कीर्ति, बुद्धि चातुर्य, सर्विस एवं व्यवसाय तथा वंश में वृद्धि होती है। स्वास्थ्य सुख का लाभ होता है।

रोग शान्ति – नीलम धारण करने या अौषधि रूप में ग्रहण करने से दमा, क्षय, कुष्ट रोग, हृदय रोग, अजीर्ण, ज्वर, खांसी, नेत्र रोग, मस्तिष्क विकार, कुष्ठ रोग, मूत्राशय सम्बन्धी रोगों में लाभकारी रहता है।

राहु रत्न गोमेद (HESSONITE)

गोमेद का रंग गोमूत्र के समान हल्के पीले रंग का, कुछ लालिमा तथा श्यामवर्ण होता है। स्वच्छ, भारी, गोमेद उत्तम होता है तथा उसमें शहद के रंग की झाई भी दिखाई देती है।

परीक्षा  – (१) शुद्ध गोमेद को  २४ घंटे तक गोमूत्र में रखने से गोमूत्र का रंग बदल जायेगा।

राहु का बीज मंत्र – ॐ भ्रां भ्रीं भ्रों सः राहवे नमः

विधिपूर्वक गोमेद धारण करने से अनेक प्रकार की बीमारियां नष्ट होती है, धन-संपत्ति-सुख-संतान वृद्धि, वकालत व राजपक्ष आदि की उन्नति के लिए अत्यन्त लाभकारी है। शत्रु-नाश हेतु भी इसका प्रयोग प्रभावी रहता है।

केतु रत्न लहसुनिया (CATS EYE)

यह नग अँधेरे में बिल्ली की आँखों के समान चमकता है। लहसुनिया ४ रंगों में पाया जाता है। काली तथा श्वेत आभा युक्त लहसुनिया जिस पर यज्ञोपवीत के समान तीन धारियाँ खिंची हों, स्वच्छ औसत से कुछ अधिक वजनी वह वैदूर्य ही उत्तम होता है। इसे सूत्रमणि भी कहते हैं।

धारण विधि – लहसुनिया रत्न बुधवार के दिन अश्विनी, मघा, मुला नक्षत्रों में रविपुष्य योग में पंचधातु की अंगुठी में कनिष्ठका अंगुली में धारण करें। धारण करने से पूर्व केतु के बीज मंत्र द्वारा अंगुठी अभिमंत्रित करें। ५ रत्ती से कम वजन का नहीं होना चाहिए। प्रत्येक ३ वर्ष के बाद नई अंगूठी में लहसुनिया जड़वाकर उसे अभिमंत्रित कर धारण करना चाहिए।

रत्न धारण करने बाद बुधवार को ही किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को तिल, तेल, कम्बल, धूम्रवर्ण का वस्त्र, सप्तधान्य (अलग-अलग रूप में ) यथशक्ति दक्षिणा सहित दान करें।
विधिपूर्वक लहसुनिया धारण करने से भूत प्रेतादि की बाधा नहीं रहती है। संतान सुख, धन की वृद्धि एवं शत्रु व रोग नाश में सहायता प्रदान करता है।

Get Divorce Problem Solution at Kundli Specialist

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *